कभी हमसे भी, पूछ लिया करो हाल-ए-दिल,
कभी हम भी तो कह सकें, दुआ है आपकी।
यूँ असर डाला है, मतलबी लोगों ने दुनिया पर,
हाल भी पूछो तो, लोग समझते हैं कि कोई काम होगा।
कफन मे लिपटा देखकर माथा चूम के मेरे दोस्त मुझसे बोले..
अरे पागल, नऐ कपडे पहन लिये तो क्या अब बात भी नही करेगा।
तूने मेरी मोहब्बत की दीवानगी को समझा ही नहीं,
मैं बारिश में भी तेरे आसुओं को पहचान लेता था।♡
अजब मुकाम पे ठहरा हुआ है..
काफिला जिंदगी का, सकून ढूढनें चले थे, नींद ही गवा बैठे।
नज़रों के तीर हम भी चलाना जानते है जनाब,
बस डरते है की निशाना कहीँ दिल पे ना चल जाये।
जब तुम नही समझे तब मैंने खुदको,
कितना समझाया है.. ये तुम नही समझोगे।
मुझको छोडने की वजह तो बता जाते..
तुम हमसे बेजार थे या हम जैसे हजार थे।
सिर्फ ख्वाब होते तो क्या बात होती,
तुम तो ख्वाहिश बन बैठे, वो भी बेइंतहा।
एक मुद्दत हो गई.. तुम लड़ती नही हो हम से,
एक अरसे से फ़ीका पड़ा है, मासूम सा इश्क़ मेरा।
कुछ ज्यादा नही जानते मोहब्बत के बारे में,
बस उन्हें सामने देखकर मेरी तलाश खत्म हो जाती है।
सुनो मेरी जान तुम्हारा हाथ पकड़कर घूमने का,
दिल करता है, चाहे वो ख़्वाबों में हो या हक़ीक़त में।
मैं मतलबी नहीं जो साथ रहने वालो को धोखा दे दू..
बस मुझे समझना हर किसी के बस की बात नहीं।
कोई भी रिश्ता ना होने पर भी जो रिश्ता निभाता हैं,
वो रिश्ता एक दिन दिल की गहराइयों को छू जाता हैं।
मत रख इतनी नफ़रतें अपने दिल में ए इंसान,
जिस दिल में नफरत होती है उस दिल में रब नहीं बसता।
अपनी खामोशी में मुझे क्यूँ तलाश रहे है हुजूर..
अपने धडकनों से पूछो मेरा एक बसेरा वहां भी है।
सबक तो तूने बहुत सिखाये ए जिंदगी,
मगर शुक्रिया तेरा किसी का दिल तोड़ना नही सिखाया।
अभी काँच हूँ इसलिए सबको चुभता हूँ,
जिस दिनआइना बन जाऊँगा, उस दिन पूरी दुनियाँ देखेगी।
अगर निगाहे हो मंज़िल पर और कदम हो राहो पर,
ऐसी कोई राह नही जो मंज़िल तक ना जाती हो।
कौन कहता है आग से आग बुझती नहीं,
हुज़ूर, दिल से ज़रा दिल, लगा कर तो देखो।
प्रेम की धारा, बहती है जिस दिल में,
चर्चा उसकी होती है, हर महफ़िल में।
चूम लेती हैं लटक कर, कभी चेहरा कभी लब,
तुमने ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पे चड़ा रखा हैं।
चेहरा देख कर इंसान पहचानने की कला थी मुझमें,
तकलीफ़ तो तब हुई जब इन्सानों के पास चेहरे बहुत थे।
होता अगर मुमकिन तो.. तुझे साँस बना कर रखते अपने दिल में,
तू रुक जाये तो मैं नही, मैं मर जाऊँ तो तूम नही।
किन लफ़्ज़ों में बंया करूँ मैं अपने दर्द को,
सुनने वाले तो बहुत है मगर समझने वाला कोई नही।
आख़िरी घूंट तक उसे पिला साक़ी,
मयकदे की कसम अभी भी होश में है वो।
आँखों मे लगाकर काजल, जुल्फों मे बसाकर बादल,
ए मेरे सनम तुम कहा चले, हवा मे ल़हरा कर आँचल।
दिल मे ना जाने कैसे तेरे लिए इतनी जगह बन गई,
तेरे मन की हर छोटी सी चाह मेरे जीने की वजह बन गई।
ब इस से ज्यादा क्या नरमी बरतू,
दिल के ज़ख्मो को छुया है तेरे गालों की तरह।
शहर भर की जुलेखाओ को पर्दे की नसीहत करने वाले बहोत हैं,
कोई मेरे शहर के यूसुफो से भी कहे के निगाहे नीची रखें।
कभी हमसे भी, पूछ लिया करो हाल-ए-दिल,
कभी हम भी तो कह सकें, दुआ है आपकी।
यूँ असर डाला है, मतलबी लोगों ने दुनिया पर,
हाल भी पूछो तो, लोग समझते हैं कि कोई काम होगा।
कफन मे लिपटा देखकर माथा चूम के मेरे दोस्त मुझसे बोले..
अरे पागल, नऐ कपडे पहन लिये तो क्या अब बात भी नही करेगा।
तूने मेरी मोहब्बत की दीवानगी को समझा ही नहीं,
मैं बारिश में भी तेरे आसुओं को पहचान लेता था।
अजब मुकाम पे ठहरा हुआ है..
काफिला जिंदगी का, सकून ढूढनें चले थे, नींद ही गवा बैठे।
नज़रों के तीर हम भी चलाना जानते है जनाब,
बस डरते है की निशाना कहीँ दिल पे ना चल जाये।
जब तुम नही समझे तब मैंने खुदको,
कितना समझाया है.. ये तुम नही समझोगे।
मुझको छोडने की वजह तो बता जाते..
तुम हमसे बेजार थे या हम जैसे हजार थे।
सिर्फ ख्वाब होते तो क्या बात होती,
तुम तो ख्वाहिश बन बैठे, वो भी बेइंतहा।
एक मुद्दत हो गई.. तुम लड़ती नही हो हम से,
एक अरसे से फ़ीका पड़ा है, मासूम सा इश्क़ मेरा।
वो किताब लौटाने का बहाना तो लाखों में था,
लोग ढुँढते रहें सबूत पैग़ाम तो आँखों मे था।
बड़े सयाने कह गए ना गुलामी करो नार की,
बेटे जब अर्थी प जाओगे, ओड़े भी थामने जरुरत पड़ेगी एक यार की।
निगाहें नाज करती है फलक के आशियाने से..
खुदा भी रूठ जाता है किसी का दिल दुखाने से।
ख्वाहिश तो ना थी किसी से दिल लगाने की..
मगर जब किस्मत में ही दर्द लिखा था.. तो मोहब्बत कैसे ना होती।
इतने भी कीमती न थे तुम,
जितनी तुम्हारी कीमत चुकाई मैंने।
दिलो जान से करेंगे हिफ़ाज़त उसकी,साहब
बस एक बार वो कह दे कि मैं अमानत हूं तेरी अब में।
फिर न कीजे मेरी गुस्ताख निगाहों का गिला
देखिये आपने ने फिर प्यार से देखा मुझको।
मैने सब कुछ पाया बस तुझको पाना बाकी है..
यु तो मेरे घर मे कुछ कमी नही है, बस तेरा आना बाकी है।
सुनो आज आखिरी बार अपनी बाहों मे सुला लो..
अगर आंख खुले तो उठा देना वरना सुबह दफना देना।
कोशिश इतनी है कोई रूठे ना हमसे,
नजर अंदाज करने वालो से नजर, हम भी नही मिलाते।
थोडा इंतजार तो कर लेते..
वक्त ही तो खराब था दिल थोडी था।
काश तेरी यादों में एक ऎसा मोड आ जाये,
जहाँ में आँखे बन्द करु और मुझे नींद आ जाये।
तेरे खामोश होठों पर मुहोब्बत गुन्गुनाती है,
तु मेरि है मैं तेरा हु बस यही आवाज़ आती है।
अगर निगाहे हो मंज़िल पर और कदम हो राहो पर,
ऐसी कोई राह नही जो मंज़िल तक ना जाती हो।
मुझे मंज़ूर थे वक़्त के हर सितम मगर,
उनसे बिछड़ जाना, ये सज़ा कुछ ज्यादा हो गई।
इश्क है या इबादत.. अब कुछ समझ नहीं आता,
एक खुबसूरत ख्याल हो तुम जो दिल से नहीं जाता।
तुझे छोड़ दूं तुझे भूल जाऊँ कैसी बातें करते हो,
सूरत तो सूरत है मुझे तो तेरे नाम के लोग भी अच्छे लगते है।
एक तू है जिसे परवाह नहीं मेरी,
एक मैं हूँ जो परेशान तेरे लिए।
कैसे मुमकिन था किसी और दवा से इलाज ग़ालिब,
इश्क़ का रोग था, बाप की चप्पल से ही आराम आया।
तुम्हारी बेरूखी ने लाज रख ली बादाखाने की,
तुम आंखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते।
अल्फाज कहाँ से लाँऊ.. तेरी बंदगी के,
महसुस हो कर बिछड़ जाते हो.. बिल्कुल हवा की तरह।
मन्नते और मिन्नते कुछ भी काम नहीं आता..
चले ही जाते हैं वो जिन्हें, जाना होता है।
मोहब्बत की हवा और मेडिकल की दवा,
इंसान की तबियत बदल देती है!
कुछ आपका अंदाज है.. कुछ मौसम रंगीन है,
तारीफ करूँ या चुप रहूँ.. जुर्म दोनो संगीन है।
कौन कहता है कि हम झूठ नही बोलते,
एक बार खैरियत तो पूछ के देखिये।
रिश्तों के दलदल से, कैसे निकलेंगे,
जब हर साज़िश के पीछे, अपने निकलेंगे।
दिल लगाना बड़ी बात नही..
दिल से निभाना बड़ी बात है।
ग़लतफहमी में जीने का मज़ा कुछ और ही है..
वरना हकीकतें तो अक्सर रुला देती है।
सांस के साथ अकेला चल रहा था,
सांस गई तो सब साथ चल रहे थे।
गर तुम-सी कोई वजह नही..
तो जीने में कोई मज़ा नही.!!
आज फिर.. उतनी ही मोहब्बत से बुलाओ ना..
कह दो.. मिलने का मन कर रहा है.. आओ ना।
दीवाना दौड़ के कोई लिपट न जाये,
आंखों में आंखें डालकर देखा न कीजिए।
देखा किये वह मस्त निगाहों से बार-बार,
जब तक.. शराब आई कई दौर चल गये।
देखा है मेरी नजरों ने, एक रंग छलकते पैमाने का,
यूँ खुलती है आंख किसी की, जैसे खुले दर मैखाने का।
देखो न आंखें भरकर किसी के तरफ कभी,
तुमको खबर नहीं जो तुम्हारी नजर में हैं।
दिखा के मदभरी आंखें कहा ये साकी ने,
हराम कहते हैं जिसको यह वो शराब नहीं।
देखो तो चश्मे-यार की जादूनिगाहियाँ,
हर इक को है गुमां कि मुखातिब हमीं से हैं।
निगाहे-लुत्फ से इकबार मुझको देख लेते है,
मुझे बेचैन करना जब उन्हें मंजूर होता है।
तेरा ये तीरे-नीमकश दिल के लिए अजाब है,
या इसे दिल से खींच ले या दिल के पार कर।
पीते-पीते जब भी आया तेरी आंखों का खयाल,
मैंने अपने हाथ से तोड़े हैं पैमाने बहुत।
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