शाम होतीं हैं परिन्दे घर को आते हैं..
और हम तो दिवानें हैं, तेरे ख्यालों में खो जाते हैं।
मैं नींद का शौक़ीन ज्यादा तो नहीं,
लेकिन कुछ खवाब ना देखूं तो गुज़ारा नहीं होता।
ना जाने.. करीब आना किसे कहते है,
मुझे तो.. आपसे दूर जाना ही नही आता।
इश्क़ वो नहीं जो तुझे मेरा कर दे,
इश्क़ वो है जो तुझे किसी और का ना होने दे।
तेरे साथ के आगे जन्नत कुछ भी नहीं,
और तेरे साथ के सिवा मेरी कोई मन्नत भी नही।
फासला रख के क्या हासिल कर लिया तुमने,
रहते तो आज भी तुम मेरे दिल में ही हो।
जिन्दगी की हर तपिश को मुस्कुरा कर झेलिए,
धूप कितनी भी हो समंदर सूखा नही करते।
नज़्मों-ग़ज़ल सी याद है हर इक बात तुम्हारी,
मेरी किताब में मेरा लिखा कुछ भी तो नहीं।
ज़िंदगी का मेरी, सिवाये सांसों के सबूत क्या है,
अजीयत ये है दिल की, कि इसका वजूद क्या है।
तुम आए हो ना, शब-ए-इंतज़ार गुज़री है,
तलाश में है सहर, बार बार गुज़री है।
मेरी गुस्ताखियो को माफ़ करना
मै तुम्हे तुम्हारी इजाजत के बिना याद करता हूँ।
दर्द तो ऐसे पीछे पड़ा है मेरे,
जैसे मैं उसकी पहली मोहब्बत हूँ।
छुपी होती है लफ्जों में गहरी राज की बातें..
लोग शायरी या मज़ाक समझ के बस मुस्कुरा देते हैं
उदासी का भी दिल नहीं लग रहा था कहीं..
सो मेरे पास आ कर बैठ गई है।
उल्फ़त के मारों से ना पूछों आलम इंतज़ार का..
पतझड़ सी है ज़िन्दगी और ख्याल है बहारो का।
ऐ हवा मत छेड़ा कर उसकी जुल्फों को यूं,
तुम्हारे लिए तो खेल हुआ, मेरी जान पे बन आती है।
अरे ओ दिल कब तक तुझे समझाये कोई,
इतनी मुद्दत में तो पागल भी सुधर जाते है।
बात कोई और होती तो हम कह भी देते उनसे,
कम्बखत मोहब्बत है.. बताई भी तो नही जाती।
सुनो.. यूँ उदास मत बैठो अजनबी से लगते हो,
प्यारी बातें नहीं करना है तो चलो झगड़ा ही कर लो।
गलत फहमी का एक पल इतना जहरीला होता है..
जो प्यार भरे सौ लम्हों को.. एक पल में भुला देता है।
ना हीरो की तमन्ना है और ना परियों पे मरता हूँ..
वो एकभोली सी लडकी हे जिसे मैं मोहब्बत करता हूँ।
तेरी मुहब्बत पर मेरा हक तो नही पर दिल चाहता है,
आखरी सास तक तेरा इंतजार करू।
मोहब्बत यूँ ही किसी से हुआ नहीं करती,
अपना वजूद भूलाना पडता है, किसी को अपना बनाने के लिए।
दुनिया में बहुत से लोग आईना देख कर डर जाते,
अगर.. आईने में चेहरा नहीं चरित्र दिखाई देता।
न लौटने की हिम्मत है न सोचने की फुर्सत
बहुत दूर निकल आए हैं तुमको चाहते हुए।
अल्फ़ाज कहाँ से लाऊं तेरी बंदगी के मैं
महसुस होकर बिछड़ जाते हो बिल्कुल हवा की तरह।
देखी है बेरुखी की आज हम ने इन्तेहाँ
हमपे नजर पड़ी तो वो महफ़िल से ही उठ गए।
कभी इतना मत मुस्कुराना की नजर लग जाए जमाने की,
हर आँख मेरी तरह मोहब्बत की नही होती।
तेरा चेहरा हैं जब से मेरी आँखों मैं,
लोग मेरी आँखों से जलते हैं..।
सायरी.. तो अपनी जान है
और इसे खुद से लिखना हमारी पहचान।।
ऐ मोहब्बत तुझे पाने की कोई राह नहीं,
शायद तू सिर्फ उसे ही मिलती है जिसे तेरी परवाह नही।
मुझे ही नहीं रहा शौक़-ए-मोहब्बत वरना
तेरे शहर की खिड़कियाँ इशारे अब भी करती हैं।
ख़त जो लिखा मैनें इंसानियत के पते पर!
डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते!
जिन्दगी की हर तपिश को मुस्कुरा कर झेलिए..
धूप कितनी भी हो समंदर सूखा नही करते.!!
तेरी जरूरत.. तेरा इंतज़ार और ये कशमकश,
थक कर मुस्कुरा देते हैं.. हम जब रो नही पाते।
मेरे माँ-बाप की दुआएं भी है इसमें शामिल..
घर फ़क़त मेरी कमाई से नहीं चलता है!!
मेरे हमदम.. तुम्हे किस किस तरह छुपाऊँ में..
मेरी मुस्कान में भी.. नजर आने लगे हो.. अब तो तुम!!
अब कहा जरुरत है हाथों मे पत्थर उठाने की,
तोडने वाले तो जुबान से ही दिल तोड देते हैं
It's helpful for me
ReplyDelete