Hindi Shayari

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यकीन और दुआ नजर नहीं आते, मगर नामुमकिन को मुमकिन बना देते हैं। अब कौन से मौसम से हम आस लगायें, बरसात में भी याद न जब उनको हम आये। ऐ दिल! मत कर इतनी मोहब्बत तू किसी से, इश्क़ में मिला दर्द तू सह नहीं पायेगा, टूट कर बिखर जायेगा एक दिन अपनों के हाथों, किसने तोड़ा ये भी किसी से कह नहीं पायेगा। यकीन और दुआ नजर नहीं आते, मगर नामुमकिन को मुमकिन बना देते हैं। मेरी आँखों में मोहब्बत की चमक आज भी है, फिर भी मेरे प्यार पर उसको शक आज भी है, नाव में बैठ कर धोये थे उसने हाथ कभी, पानी में उसकी मेहँदी की महक आज भी है।

तुम बहुत दिल-नशीन थे मगर.. जब से किसी और के हो गए हो.. ज़हर लगते हो।


मुझसे बिछड़े अरसा बीता,
जाने अब वो किससे लड़ता होगा।

बच्चों को पैरों पर, खड़ा करना था,
पिता के घुटने, इसी में जवाब दे गये।

हम सादगी में झुक क्या गए,
लोगों ने समझा हमारा दौर ही खत्म हो गया।

मिल जाएंगे हमारी भी तारीफ करने वाले,
कोई हमारी मौत की अफवाह तो फैला दो।

अगर नए रिश्ते न बनें तो, मलाल मत करना,
पुराने टूट ना जायें बस, इतना ख्याल रखना।

ऐ-जिंदगी तू खेलती बहुत है खुशियों से,
हम भी इरादे के पक्के हैं मुस्कुराना नहीं छोडेंगे।

आँखों की झील से दो कतरे क्या निकल पड़े,
मेरे सारे दुश्मन एकदम खुशी से उछल पडे़।

जहाँ भी जिक्र हुआ सुकुन का,
वही मुझे तेरी बाहों कि तलब लग जाती हैं।

बंद लिफाफा था अब तो इश्तहार हो गयी,
मेरी मासूम सी मोहब्बत अखबार हो गयी।

कोन कैसा है, ये ही फ़िक्र रही तमाम उम्र
हम कैसे है, ये कभी भूल कर भी नही सोचा।

यूँ ना छोड़ जिंदगी की किताब को खुला,
बेवक्त की हवा ना जाने कौन सा पन्ना पलट दे।

जाने लोग मोहब्बत को क्या-क्या नाम देते हैं
हम तो तेरे नाम को ही मोहब्बत कहते हैं।

हम तुम बैठे ही नहीं, इक मुद्दत से संग,
यार गिलासों को कहीं, लग ना जाये ज़ंग।

सुनना चाहते है एक बार आवाज उनकी
मगर बात करने का बहाना भी तो नहीं आता मुझे।

ना आवाज हुई.. ना तमाशा हुआ,
बड़ी ख़ामोशी से टूट गया.. एक भरोसा जो तुझ पर था।

वो मेरा वहम था कि मैँने उसे, अपना हम सफर समझा
वो चलता तो मेरे साथ था पर किसी और की तलाश मे।

फ़ासला भी ज़रूरी था.. चिराग़ रौशन करते वक़्त
ये तज़ुर्बा हासिल हुआ.. हाथ जल जाने के बाद।

जितने दिन तक जी गई, बस उतनी ही है जिन्दगी,
मिट्टी के गुल्लकों की कोई उम्र नहीं होती।

अभी तो साथ चलना है समंदर की मुसाफत में
किनारे पर ही देखेंगे किनारा कौन करता है।

मुर्शिद की याद आई है, सांसों ज़रा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में खलल पडता है।

मेरे ऐब गिनाने वाले,
तेरा ये ऐब मेरे हर ऐब से बडा है।

वो कहता है कि बता तेरा दर्द कैसे समझूँ,
मैंने कहा.. इश्क़ कर और कर के हार जा।

कोई भी हो हर ख़्वाब तो अच्छा नही होता,
बहुत ज्यादा प्यार भी अच्छा नहीं होता है।

बारूद के इक ढेर पे बैठी हुई दुनिया,
शोलों से हिफ़ाज़त का हुनर पूछ रही है।

 जलजले ऊँची इमारत को गिरा सकते हैं,
मैं तो बुनियाद हूँ मुझे कोई खौफ नहीं।

 मन ख्वाहिशों मे अटका रहा,
और ज़िन्दगी हमें जी कर चली गई।

 एक चेहरा पड़ा मिला.. रास्ते पर मुझे,
ज़रूर किरदार बदलते वक़्त गिरा होगा।

 तुम बहुत दिल-नशीन थे मगर..
जब से किसी और के हो गए हो.. ज़हर लगते हो।

जख्म ही देना था तो पूरा जिस्म तेरे हवाले था,
तूने जब भी वार किया तो सिर्फ दिल को ही ज़ख्मी किया।

मशहूर होने का शौक किसे है साहब,
हमे तो हमारे अपने ही ठीक से पहचान ले तो भी बहुत हैं।

एक चाहत थी.. तेरे साथ जीने की,
वरना, मोहब्बत तो किसी से भी हो सकती थी।

कोशिश हज़ार की के इसे रोक लूँ मगर,
ठहरी हुई घड़ी में भी.. ठहरा नहीं ये वक्त।

मुझको छोड़ने की वजह.. तो बता देते,
मुझसे नाराज थे या मुझ जैसे हजारों थे।

शायरी भी एक खेल है शतरंज का,
जिसमे लफ़्ज़ों के मोहरे मात दिया करते हैं एहसासों को।

कागज के बेजान परिंदे भी उड़ते है,
जनाब, बस डोर सही हाथ में होनी चाहिए।

मुझे तलाश है उन रास्तों कि, जहां से कोई गुज़रा न हो,
सुना है.. वीरानों मे अक्सर, जिंदगी मिल जाती है।

मोहब्बत की शतरंज में वो बड़ा चालाक निकला,
दिल को मोहरा बना कर हमारी जिन्दगी छीन ली।

गलतफहमी की गुंजाईश नहीं सच्ची मोहब्बत में,
जहाँ किरदार हल्का हो, कहानी डूब ही जाती है।

जहाँ भी ज़िक्र हुआ सुकून का..
वहीँ तेरी बाहोँ की तलब लग जाती हैं।

बहुत से लोग कहते है मोहब्बत जान ले लेती है..
मोहब्बत जान नहीं लेती है बिछड़ने पर यादें अंदर से तोड़ जाती है।

बड़ी अजीब है ये मोहब्बत..
वरना अभी उम्र ही क्या थी शायरी करने की।

कोई तो आ के रुला दे कि हँस रहें हैं,
बहुत दिनों से ख़ुशी को तरस रहें हैं।

तेरा आधे मन से मुझको मिलने आना,
खुदा कसम मुझे पूरा तोड़ देता है।

‪धड़कनो मे बस्ते है कुछ लोग,
जबान पे नाम लाना जरूरी नही होता।

उसकी याद आयी है सांसो जरा अहिस्ता चलो,
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है।

मेरी रूह गुलाम हो गई है तेरे इश्क़ में शायद,
वरना यूँ छटपटाना मेरी आदत तो ना थी।

शर्म नहीं आती उदासी को जरा भी,
मुद्दतों से मेरे घर की महेमान बनी हुई है।

मैं शिकायत क्यों करूँ, ये तो क़िस्मत की बात है,
तेरी सोच में भी मैं नहीं, मुझे लफ्ज़ लफ्ज़ तू याद है।

काश.. बनाने वाले ने थोड़ी-सी होशियारी और दिखाई होती,
इंसान थोड़े कम और इंसानियत ज्यादा बनाई होती।

‪रोता वही है जिसने महसूस किया हो सच्चे रिश्ते को,
वरना मतलब के रिश्तें रखने वाले को तो कोई भी नही रूला सकता।

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