Hindi Shayari

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यकीन और दुआ नजर नहीं आते, मगर नामुमकिन को मुमकिन बना देते हैं। अब कौन से मौसम से हम आस लगायें, बरसात में भी याद न जब उनको हम आये। ऐ दिल! मत कर इतनी मोहब्बत तू किसी से, इश्क़ में मिला दर्द तू सह नहीं पायेगा, टूट कर बिखर जायेगा एक दिन अपनों के हाथों, किसने तोड़ा ये भी किसी से कह नहीं पायेगा। यकीन और दुआ नजर नहीं आते, मगर नामुमकिन को मुमकिन बना देते हैं। मेरी आँखों में मोहब्बत की चमक आज भी है, फिर भी मेरे प्यार पर उसको शक आज भी है, नाव में बैठ कर धोये थे उसने हाथ कभी, पानी में उसकी मेहँदी की महक आज भी है।

Mirza galib (shayari)


                           Mirza galib (shayari)
                             मिर्जा ग़ालिब (शायरिया)



शायरियो का शौक रखने वाला हर इन्सान मिर्जा ग़ालिब के नाम से वाकिफ होगा | Mirza Ghalib को शायरी शब्द का पर्यायवाची भी कह सकते है | उनके द्वारा लिखी शायरिया बच्चे जवान और बुढो सबको पसंद आती है | Mirza Ghalib की शायरिया ना केवल भारत और पाकिस्तान बल्कि विश्व के कई देशो में मशहूर है |  ग़ालिब ने अपने 70 साल के जीवन में कई शायरिया लिखी है |                                   मिर्ज़ा ग़ालिब की कुछ मशहूर शायरिया...!!!                    






तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा 
  नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख...






खुदा के वास्ते पर्दा न रुख्सार से उठा ज़ालिम 
कहीं ऐसा न हो जहाँ भी वही काफिर सनम निकले...






बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब 
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है...






तोड़ा कुछ इस अदा से तालुक़ उस ने ग़ालिब 
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे...





हाथो की लकीरों में मत जा ए ग़ालिब
किस्मत उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते




हर एक बात पर कहते हो के तुम के तू क्या है
तुम्ही कहो के ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है




जिक्र उस परी वश का और फिर बयाँ अपना
बन गया रकीब आखिर था राजदान अपना



पीने दे शराब मस्जिद में बैठकर ए ग़ालिब ,
या वो जगह बता जहा खुदा नहीं




कल भी कल की बात हुई आज भी कल में बीत गया ,
कल फिर कल में आज हुआ फिर यु ही जमाना बीत गया




रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल ,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है




उन्हें देखकर चेहरे पर आती है रौनक ,
और वो समझते है बीमार का हाल अच्छा है




मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे ,
तू देख की क्या रंग है तेरा मेरे आगे




मोहब्बत में नहीं है ,फर्क जीने और मरने का ,
उसी को देखकर जीते है जिस काफिर पर दम निकले




कहू किसे मै कि क्या है शब ए ग़म बुरी बला है ,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता




इश्क है अपने उसूलो पे अजाल से कायम ,
इम्तेहा जिसकी भी लेता है रियायत नहीं करता




घर हमारा ,जो ना रोते तो भी , वीरान होता ,
बेहर अगर बेहर ना होता तो बयाबान होता




सैर कर दुनिया की ग़ालिब ,जिन्दगिया फिर कहा
जिंदगानी गर रही तो , नौजवानिया फिर कहा’




जलता है जिस्म जहा दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो अब राख , जुस्तजू क्या है




मस्जिद खुदा का घर है ,पीने की जगह नहीं
काफिर के दिल में जा , वहा खुदा नहीं




तेरी वफा से क्या हो , तलफी की दहर में
तेरे सिवा भी हम पर बहुत से सितम हुए




मैंने मोहब्बत के नशे में आकर उसे खुदा बना डाला
होश तब आया जब उसने कहा कि, खुदा किसी एक का नहीं होता




इस कदर तोडा है मुझे उसकी बेवफाई ने ए ग़ालिब
अब कोई अगर प्यार से भी देखे तो बिखर जाता हु




कल तक तो कहते थे ग़ालिब , बिस्तर से उठा नहीं जाता
आज दुनिया से जाने की ताकत कहा से आ गयी




हजारो ख्वाहिशे ऐसी की हर ख्वाहिश पर दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले




दिया है दिल अगर उसको , बशर ए क्या कहिये
हुआ रकीब नामाबार है , क्या कहिये




काफिर के दिल से आया हु मै ये देखकर
खुदा मौजूद है वहा , पर उसे पता नहीं




बस के दुश्वार है हर काम का आसान होना
आदमी को भी मंजूर नही इन्सान होना




कितना खौफ होता है शाम के अंधेरो में
पूंछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते




आइना देख अपना सा मुह लेके रह गये
साहब को दिल ना देने पर इतना गुरुर था




हम तो फना हो गये उसकी आँखे देखकर ग़ालिब
ना जाने वो आइना कैसे देखते होंगे |




कल तक जो जो लोग डरते थे पानी की एक बूंद से
दरिया का रुख बदलते ही तैराक बन गये




कुछ से क्या होगा , बहुत कुछ से बहुत कुछ होगा
अगर हम से ही शुरवात करे तो आगे चलकर बहुत कुछ होगा




आज क्यों लौट गया मेरा खाली घर देखकर
शायद उसे भी यकीन हुआ मेरी मोहब्बत पर




इश्क ने ग़ालिब निकम्मा बना दिया
वरना आदमे हम भी थे काम के




तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख




इश्क पर जोर नही , है ये वो आतिश ग़ालिब
के लगाये ना लगे , बुझाये ना बुझे




लिख देना ये मिसरा मेरी संग-ए-लेहाद पर
की मौत अच्छी है मगर दिल का लगाना अच्छा नहीं




क्या सुनाऊ मै अपनी वफा की कहानी ग़ालिब
एक समन्दर का रखवाला था और सारी उम्र प्यासा रहा




ठिकाना कबर है तेरा , इबादत तू कुछ कर ग़ालिब
कहावत है कि खाली हाथ किसी के घर नहीं जाते




अक्ल वालो के मुक्कदर में ये जूनून कहा ग़ालिब
ये इश्क वाले है जो हर चीज लुटा देते है




सेहरा को बड़ा नाज है अपनी वीरानी पर
उसने देखा नही आलम मेरी तन्हाई का




ख़ाक मुट्ठी में लिए कबर की ये सोचता हु ग़ालिब
इन्सान जो मरते है तो गुरुर कहा जाता है




ज़माना रोयेगा , बरसों हमे भी याद करके
गिनेंगे सब हमारी खूबिया , जब हम ना होंगे




मै तो सुखा हुआ पत्ता हु मेरी बात ही क्या
फूल पैरो से मसलते है तेरे शहर के लोग




ज़िंदगी को गम-ए-दास्ताँ मत बना ए ग़ालिब
मुर्दा तो वो भी है जिनकी , नब्ज है धडकनों से रुक्सत






तो मित्रो अगर इनमे से कोई आपकी पसंदीदा मिर्जा ग़ालिब की शायरी Mirza Ghalib Shayari  रह गयी हो तो कमेंट में वो शायरी लिखना ना भूले |

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